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धर्मांतरण विरोधी कानून पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका

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Written by
Chavan

याचिका-का मूल विषय

प्राप्त खबर के द्वारा यह जानकारी सामने आई है की,

• ADF India और CCF इन दो संस्थाओं के द्वारा उनके के सहयोगी वकीलों ने उत्तर प्रदेश में धर्मांतरण विरोधी कानून के 2024 संशोधनों को चुनौती दी है, विशेषकर Uttar Pradesh Prohibition of Unlawful Conversion of Religion Act, 2021 में जो बदलाव जुलाई 2024 में हुए थे।

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• याचिका कहती है कि ये संशोधन बहुत कठोर हैं, और धर्मांतरित व्यक्तियों, चर्चों, अल्पसंख्यक समुदायों आदि पर अनुचित प्रभाव डालते हैं।

याचिका में शामिल प्रमुख प्रावधान जो. चुनौती के दायरे में हैं

भारी सजा और कड़ी सज़ाएँ

• संशोधन में ऐसा प्रावधान है कि यदि धर्मांतरण “धोखा, बल, विवाह के माध्यम से प्रेरित” आदि तरीके से किया गया हो, तो आरोपी को *न्यायालय द्वारा न्यूनतम 20 वर्ष सश्रम कारावास (rigorous imprisonment) हो सकता है, और यह सजा आजीवन कारावास तक बढ़ सकती है।

तीसरा पक्ष शिकायत (third-party complaint) की अनुमति

• नए कानून प्रावधानों में यह शामिल है कि कोई भी व्यक्ति — चाहे प्रभावित व्यक्ति न हो — सरकारी अधिकारियों के पास शिकायत कर सकता है कि किसी ने धर्मांतरण किया है।

• मानव मर्यादा, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, धर्म की स्वतंत्रता व अन्य मौलिक अधिकारों का उल्लंघन

• याचिकाकर्ता दलीलें दे रहे हैं कि ये कानून व्यक्तिगत निर्णय, निजता, धार्मिक आस्था की स्वतंत्रता, जीवन और गरिमा (Article 21), धर्म आस्था और धार्मिक अभ्यास की स्वतंत्रता (Article 25) आदि को बाधित करते हैं।

• रिवर्स बर्डन ऑफ प्रूफ (बोझ साबित करने का उलटा नियम)

• कुछ कानूनों में आरोपित व्यक्ति को यह साबित करना होगा कि धर्मांतरण स्वेच्छा से हुआ, न कि किसी ने उसे धोखा, दबाव, कॉर्स या अन्य किसी तरीके से प्रभावित किया। याचिकाकर्ता कह रहे हैं कि यह सिद्ध करने का बोझ असमय और न्याय-विरोधी है।

बेल के नियमों पर कड़ी शर्तें (twin bail conditions)

• खास तौर पर उत्तर प्रदेश कानून में संशोधन के बाद, बरी होने (bail) की शर्तें बहुत कठिन बनाई गईं हैं, जिससे लोग आसानी से बेल नहीं पा सकेंगे।

याचिकाकर्ता (petitioners) के मुख्य तर्क

• ये कानून “love-jihad” जैसे कन्फ्लिक्टिंग और विवादित विचारों के आधार पर बनाए गए हैं, और अक्सर ये अल्पसंख्यक समुदायों को टारगेट करते हैं।

• राज्य सरकारें और पुलिस प्राईवेट जीवन, धर्म आस्था, विवाह-स्वतंत्रता आदि मामलों में हस्तक्षेप कर रही हैं। लोगों को डर, अशांति तथा सामाजिक और कानूनी वैमनस्यता का सामना करना पड़ रहा है।

• याचिकाकर्ताओं ने कहा है कि prior notification (पूर्व सूचना) या declaration की आवश्यकता जैसे प्रावधान ख़ुद कानून बनाने वालों की मर्जी पर निर्भर करने वाले प्रावधान हैं, और ये संविधान के अनुच्छेद 21, 25 आदि के तहत सुरक्षित व्यक्तिगत अधिकारों का उल्लंघन करते हैं।

परमादेश / कोर्ट ने क्या कदम उठाए हैं

निलंबन (Stay / Pause)

• सुप्रीम कोर्ट ने यूपी को निर्देश दिया है कि वह 2024 के संशोधनों को लागू न करे, यानी कि उन प्रावधानों पर रोक लगाये जब तक कि पूरा मामला नहीं सुलझ जाता है।

राज्यों से जबाव (Responses) तलब

• सुप्रीम कोर्ट ने उन राज्यों से जवाब मांगा है जिन्होंने धर्मांतरण विरोधी कानून बनाए हैं, यह बताने के लिए कि वे इन दायर याचिकाओं और अंतरिम रोक की मांगों पर क्या रुख रखते हैं।

 मुकदमे की सुनवाई का शेड्यूल

• राज्यों को लगभग चार हफ्ते का समय दिया गया है जवाब दाखिल करने के लिए। बाद में छह हफ्तों के अंदर कोर्ट सुनवाई करेगा कि क्या इन कानूनों पर अंतरिम रोक (interim stay) लगाया जाए।

पेटीशन्स का समेकन (Transfer / Consolidation)

• सुप्रीम कोर्ट ने कई मामलों को High Courts से अपने पास ट्रांसफर किया है ताकि समान मुद्दों पर एक समान निर्णय हो सके।

☆ टीप ☆

मामला अभी विचाराधीन है और अंतिम निर्णय आना बाकी है.

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