
नई दिल्ली, 17 अक्तूबर 2025 (PM News India):
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने Rajendra Bihari Lal & Another vs State of Uttar Pradesh & Others (2025 INSC 1249) केस में एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए उत्तर प्रदेश गैरकानूनी धर्मांतरण प्रतिषेध अधिनियम, 2021 के तहत दर्ज फतेहपुर जिले की पाँच एफआईआर को रद्द कर दिया। यह फैसला न केवल निर्दोष नागरिकों के लिए न्याय की जीत है, बल्कि देशभर में धार्मिक स्वतंत्रता और संविधान की भावना को सुदृढ़ करने वाला निर्णय भी है।
क्या था मामला?
फतेहपुर जिले में वर्ष 2022 से 2023 के बीच कई लोगों पर जबरन धर्मांतरण के आरोप लगाकर एफआईआर दर्ज की गई थीं—
एफआईआर नंबर 224/2022, 47/2023, 54/2023, 55/2023, और 60/2023।
हालांकि जांच में पाया गया कि इनमें से अधिकांश शिकायतें रुचि रखने वाले व्यक्तियों द्वारा दी गई थीं, जबकि कोई भी “कथित पीड़ित” स्वयं पुलिस के पास नहीं गया था।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ और निर्णय
यह फैसला न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और मनोज मिश्रा की दो सदस्यीय पीठ ने सुनाया।
पीठ ने कहा कि—
“क्रिमिनल लॉ निर्दोष नागरिकों को डराने या सताने का औजार नहीं बन सकता।”
कोर्ट ने पाया कि कई शिकायतों में आधार कार्ड, गवाह बयानों और दस्तावेजों का एक जैसा प्रारूप था, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि ये मामले पूर्व नियोजित और साक्ष्यहीन थे। इस आधार पर न्यायालय ने सभी पाँच एफआईआर को अवैध और प्रक्रिया-विरोधी मानते हुए रद्द कर दिया।
कानूनी आधार
फैसले का प्रमुख आधार संविधान का अनुच्छेद 32 था — जो नागरिकों को उनके मौलिक अधिकारों के हनन की स्थिति में सीधे सुप्रीम कोर्ट में जाने का अधिकार देता है।
न्यायालय ने टी.टी. एंटोनी बनाम स्टेट ऑफ केरल (2001) के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि —
“एक ही घटना पर बार-बार एफआईआर दर्ज करना कानून का दुरुपयोग है।”
साथ ही कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि धर्म के नाम पर सामाजिक सेवा या विदेशी सहायता प्राप्त करना अपराध नहीं है, जब तक कि जबरन या छलपूर्वक धर्मांतरण का ठोस प्रमाण न हो।
फैसले का महत्व
यह निर्णय भारत में धर्मांतरण कानूनों के दुरुपयोग को रोकने, और धार्मिक स्वतंत्रता (Article 25) की रक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया कि किसी भी राज्य या एजेंसी को ईसाई मिशनों, चर्चों या समाजसेवी संगठनों को टारगेट करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
विशेषज्ञों की राय
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला “भारत के संविधान में निहित धर्मनिरपेक्षता की भावना” को पुनः सशक्त करता है।
यह उन हजारों निर्दोष लोगों के लिए राहत का संकेत है जिन्हें केवल “शक” या “पूर्वाग्रह” के आधार पर अपराधी बना दिया गया था।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय सिर्फ फतेहपुर के एक केस की राहत नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए न्याय, संवैधानिक अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता की नई मिसाल है।
इस फैसले ने यह सख्त संदेश दिया है कि —
“कानून का इस्तेमाल किसी समुदाय या व्यक्ति को डराने, बदनाम करने या अन्यायपूर्ण ढंग से फंसाने के लिए नहीं किया जा सकता।”
PM News India का संपादकीय दृष्टिकोण
हम मानते हैं कि यह फैसला भारत के लोकतंत्र और न्याय प्रणाली में विश्वास को मजबूत करता है।
अब जरूरी है कि राज्य सरकारें और जांच एजेंसियाँ ऐसे मामलों में कानून का निष्पक्ष, तथ्य-आधारित और संवैधानिक उपयोग सुनिश्चित करें।










