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मसीही समाज में एकता की आवश्यकता : प्रभु की इच्छा और समय की पुकार

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Written by
Chavan

 


मसीही समाज में एकता की आवश्यकता : प्रभु की इच्छा और समय की पुकार

आज के समय में मसीही समाज के सामने सबसे बड़ी चुनौती “एकता की कमी” है। जबकि अन्य धर्मों में अपने विश्वास और समुदाय के प्रति एक गहरा जुड़ाव दिखाई देता है, वहीं मसीही समाज अनेक छोटे-छोटे मतों, सम्प्रदायों और संस्थाओं में बंटा हुआ है। यह बँटवारा न केवल समाज की शक्ति को कम करता है, बल्कि प्रभु यीशु मसीह की उस शिक्षा के भी विपरीत है, जो उन्होंने स्वयं अपने जीवन में दिखाई थी।

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 प्रभु यीशु की प्रार्थना : “जैसे हम एक हैं, वैसे वे भी एक हों”

यूहन्ना 17:21 में प्रभु यीशु ने कहा —

“हे पिता, जैसे तू मुझ में है और मैं तुझ में हूँ, वैसे ही वे भी हम में एक हों, ताकि संसार विश्वास करे कि तू ने मुझे भेजा है।”

यह वचन प्रभु की उस गहरी इच्छा को दर्शाता है कि उनके अनुयायी — चाहे किसी भी पंथ, भाषा, जाति या प्रदेश से हों — एक शरीर, एक आत्मा और एक विश्वास में जुड़ें।

 भजन संहिता की सच्चाई

भजन संहिता 133:1 में लिखा है —

“देखो, भाइयों का मिलकर रहना क्या ही भला और मनोहर है!”

जब भाई एकता में रहते हैं, तब वहाँ प्रभु की आशीष और शांति का निवास होता है। विभाजन जहाँ होता है, वहाँ विवाद, आलोचना और दुर्बलता घर कर जाती है।

 आज की वास्तविकता

मसीही समाज में मत-भेद, संगठनात्मक प्रतियोगिता, और व्यक्तिगत प्रतिष्ठा की भावना ने एकता की जड़ें कमजोर की हैं। कोई कैथोलिक है, कोई प्रोटेस्टेंट, कोई पेंटेकोस्टल, कोई इंडिपेंडेंट — परंतु प्रभु यीशु के लिए हम सब एक शरीर के अंग हैं। यदि एक अंग दुखी होता है तो पूरा शरीर प्रभावित होता है।

 एकता क्यों आवश्यक है

  • साक्षी का प्रभाव बढ़ाने के लिए: जब मसीही लोग एकता में खड़े होते हैं, तो संसार में मसीह की गवाही और अधिक प्रभावशाली होती है।
  • संकट के समय सहयोग के लिए: उत्पीड़न, अन्याय या धार्मिक भेदभाव के समय एकता ही सुरक्षा का कवच बनती है।
  • सेवा और समाज निर्माण के लिए: शिक्षा, स्वास्थ्य, और गरीबों की सेवा जैसे क्षेत्रों में एक साथ कार्य करने से प्रभु का राज्य अधिक दृढ़ता से स्थापित होता है।

   अब समय है जागने का

यह समय है कि हम अपने मतभेदों को भुलाकर, “मसीह में एकता” की भावना से जुड़ें। चर्च, संगठन, और पास्टर्स को एक-दूसरे की सहायता करनी चाहिए, आलोचना नहीं। प्रेम, क्षमा और नम्रता ही सच्ची मसीही पहचान है।

निष्कर्ष

मसीही समाज की एकता केवल संगठनात्मक नहीं, बल्कि आत्मिक एकता होनी चाहिए — जो मसीह में जड़ित हो।
आओ, हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि हम अपने प्रभु के वचन पर चलेंगे —

“एक देह, एक आत्मा, एक प्रभु, एक विश्वास और एक बपतिस्मा।” (इफिसियों 4:4-5)


लेखक: PM News India Desk

 

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