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भ्रमित होती मंडली और जिम्मेदार अगुवाई का संकट.

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Written by
Chavan

भ्रमित होती मंडली और जिम्मेदार अगुवाई का संकट

आज की मसीहीहत : आत्मिक शक्ति या संस्थागत दिखावा?

आज देश के अनेक हिस्सों में मसीही समाज एक गहरे विरोधाभास से गुजर रहा है। एक ओर उत्पीड़न, हिंसा, और अन्याय बढ़ रहा है; दूसरी ओर मसीही समाज के भीतर ही भ्रम, निराशा और ठंडापन फैलता जा रहा है। इसका एक बड़ा और कड़वा कारण है — अगुवों का असंगत जीवन और व्यवहार।

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यह कहना कठिन है, पर सत्य है कि अधिकतर मसीही लोग आज वचन से नहीं, बल्कि अगुवों के जीवन को देखकर भ्रमित हैं।

अगुवों का जीवन और मंडली की दिशा

मसीही विश्वास केवल उपदेशों से नहीं, बल्कि जीवन के उदाहरण से आगे बढ़ता है। जब अगुवे जो मंच से बोलते हैं, वही अपने व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन में नहीं जीते, तो मंडली के मन में प्रश्न उठता है—

“सच क्या है?”

आज कई स्थानों पर लोग देखते हैं—

• उपदेश पवित्रता के, पर जीवन में समझौता

• सेवा के शब्द, पर व्यवहार में कठोरता

• नम्रता की शिक्षा, पर नेतृत्व में अहंकार

परिणामस्वरूप मसीहीहत मजबूत और पवित्र बनने के बजाय, संस्थागत, औपचारिक और आत्मिक रूप से कमजोर होती जा रही है।

परमेश्वर की दृष्टि में अगुवाई

बाइबल स्पष्ट रूप से सिखाती है कि अगुवाई पद नहीं, बल्कि जिम्मेदारी है।

“पर जैसा तुम्हारा बुलानेवाला पवित्र है, वैसे ही तुम भी अपने सारे चाल-चलन में पवित्र बनो।”

— 1 पेत्रस 1:15

यह वचन विशेष रूप से अगुवों के लिए चेतावनी और मार्गदर्शन दोनों है। क्योंकि जब अगुवे पवित्रता से समझौता करते हैं, तो उसका प्रभाव पूरी मंडली पर पड़ता है।

क्यों कमजोर पड़ रही है मसीही गवाही?

मसीही गवाही इसलिए कमजोर नहीं हो रही कि—

• वचन में सामर्थ नहीं है

• परमेश्वर बदल गया है

बल्कि इसलिए कि— वचन को धारण करने वाले जीवन कमजोर हो गए हैं।

जब कथनी और करनी में अंतर दिखता है, तो मसीही समाज की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लग जाता है — न केवल बाहरी समाज में, बल्कि स्वयं विश्वासियों के बीच।

आत्ममंथन का समय

यह समय एक-दूसरे पर दोष डालने का नहीं, बल्कि आत्म-परीक्षण का है।

हर अगुवे को स्वयं से यह प्रश्न पूछना चाहिए:

• क्या मेरे जीवन से लोग मसीह को देख पा रहे हैं?

• क्या मेरी अगुवाई लोगों को परमेश्वर के करीब ला रही है या दूर?

• क्या मैं पद के लिए जी रहा हूँ या बुलाहट के लिए?

जब तक यह आत्ममंथन नहीं होगा, तब तक मसीहीहत बाहरी चुनौतियों का सामना करने में कमजोर बनी रहेगी।

आशा अभी भी बाकी है

इतिहास गवाह है कि परमेश्वर ने कभी भी भीड़ से नहीं, बल्कि कुछ समर्पित और पवित्र जीवनों से परिवर्तन लाया है। आज भी वह ऐसे अगुवों और विश्वासियों को खोज रहा है जो—

• समझौता न करें

• सत्य को प्रेम में बोलें

• पद से अधिक चरित्र को महत्व दें

ऐसे जीवन ही मसीहीहत को फिर से मजबूत, पवित्र और प्रभावशाली बना सकते हैं।

निष्कर्ष

आज मसीही समाज को सबसे अधिक आवश्यकता है— सच्ची, जिम्मेदार और पवित्र अगुवाई की।

यदि अगुवे सुधरेंगे, तो मंडली सशक्त होगी।

यदि जीवन बदलेगा, तो गवाही जीवित होगी।

और तभी मसीहीहत वैसी बनेगी, जैसी परमेश्वर चाहता है।

 

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