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मसीही समाज के विरुद्ध बढ़ती घृणा: यह धर्म का प्रश्न नहीं, संविधान और शांति का संकट है

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Written by
Chavan

मसीही समाज के विरुद्ध बढ़ती घृणा: यह धर्म का प्रश्न नहीं, संविधान और शांति का संकट है

भारत अपनी विविधता, सहिष्णुता और सह-अस्तित्व की परंपरा के लिए जाना जाता रहा है। सदियों से यहाँ विभिन्न धर्म, भाषा और संस्कृतियाँ एक-दूसरे के साथ सम्मानपूर्वक रहती आई हैं। लेकिन हाल के वर्षों में जिस प्रकार मसीही समाज, बाइबिल, प्रार्थना, चर्च, यीशु मसीह और क्रॉस के विरुद्ध संगठित घृणा दिखाई दे रही है, वह केवल किसी एक समुदाय के लिए नहीं, बल्कि भारत की सामाजिक शांति और संवैधानिक व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी है।

पहले यह नफरत क्यों नहीं दिखती थी?

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यह सच है कि पहले भी मतभेद थे, वैचारिक असहमति थी, लेकिन धार्मिक आस्था को व्यक्तिगत स्वतंत्रता माना जाता था। चर्च, मस्जिद, मंदिर — ये सब आस्था के स्थल थे, न कि टकराव के मैदान।

आज स्थिति बदली हुई दिखती है। अब असहमति, घृणा में बदली जा रही है, और असहमति रखने वालों को “दुश्मन” के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।

घृणा फैलाने के तरीके और चिंताजनक घटनाएँ

आज हम देख रहे हैं कि:

• चर्च की प्रार्थनाओं में बाधा डाली जा रही है

• विरोध करने वाले लोग चर्च के पुलपीठ तक घुस रहे हैं

• बाइबिल की छपाई (production) पर सवाल उठाकर भ्रम फैलाया जा रहा है

• मसीही स्त्रियों के साथ अश्लील और अपमानजनक भाषा का प्रयोग किया जा रहा है

• सोशल मीडिया पर झूठे आरोपों की बाढ़ लाई जा रही है

ये घटनाएँ किसी स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान नहीं हैं।

क्या यह डर का परिणाम है?

प्रश्न उठता है — मसीही समाज से इतना डर क्यों?

मसीही समाज न तो हिंसक है,

न ही वह किसी पर जबरन आस्था थोपता है।

वह शांति, सेवा, शिक्षा और प्रेम का संदेश देता है।

दरअसल, डर संख्या से नहीं, सिद्धांत से है।

यीशु मसीह की शिक्षाएँ — प्रेम, क्षमा, सत्य और न्याय —

उन ताकतों को असहज करती हैं, जो नफरत और डर की राजनीति पर खड़ी हैं।

धर्म नहीं, संविधान निशाने पर है

यह समझना आवश्यक है कि यह संघर्ष धर्म बनाम धर्म नहीं है।

यह संघर्ष है:

• संविधान बनाम भीड़तंत्र

• कानून बनाम अफवाह

• नागरिक अधिकार बनाम वैचारिक कट्टरता

भारतीय संविधान:

• अनुच्छेद 25–28 के अंतर्गत धार्मिक स्वतंत्रता देता है

• अनुच्छेद 14 के तहत समानता सुनिश्चित करता है

• अनुच्छेद 21 जीवन और गरिमा का अधिकार देता है

जब किसी समुदाय को डराया जाता है, उसकी प्रार्थना रोकी जाती है, उसकी महिलाओं को अपमानित किया जाता है — तब केवल एक धर्म नहीं, संविधान का उल्लंघन होता है।

संवैधानिक तरीकों से ही सवाल क्यों नहीं?

यदि किसी को आपत्ति है, तो अदालतें खुली हैं, कानून मौजूद हैं।

लेकिन समस्या यह है कि:

• संविधान पढ़ने से ज़्यादा, अफवाहें फैलाना आसान है

• सबूतों से बात करने के बजाय, भीड़ बनाना सरल है

• कानूनी प्रक्रिया से डर लगता है, क्योंकि वहाँ नफरत नहीं, तथ्य चलते हैं

नरमी क्यों दिखाई जाती है?

अक्सर यह देखा जाता है कि ऐसे मामलों में प्रशासन और व्यवस्था “तनाव न बढ़े” के नाम पर अनुचित नरमी दिखाती है।

लेकिन याद रखना चाहिए:

न्याय में देरी और पक्षपात, अन्याय को जन्म देता है।

PM News India का स्पष्ट दृष्टिकोण

PM News India यह स्पष्ट करता है कि:

• भारत सभी धर्मों का देश है

• मसीही समाज भारत का अभिन्न नागरिक समुदाय है

• शांति-प्रिय होना कमजोरी नहीं, नैतिक शक्ति है

• घृणा, धमकी और अपमान किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं है

निष्कर्ष

आज सवाल केवल मसीही समाज का नहीं है।

आज सवाल यह है कि क्या भारत संविधान से चलेगा या भीड़ के शोर से?

यदि आज एक समुदाय की आवाज़ दबाई गई,

तो कल कोई और होगा।

शांति, सह-अस्तित्व और संविधान —

यही भारत की असली पहचान है।

इसे बचाना हर जिम्मेदार नागरिक की जिम्मेदारी है।

संपादकीय टीम, PM News India

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