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मसीही पवित्रता : भय से नहीं, आत्म-संयम और विजय से

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Written by
Chavan

 मसीही पवित्रता : भय से नहीं, आत्म-संयम और विजय से 

एक वैचारिक विश्लेषण | PM News India

आज मसीही समाज में पवित्रता को लेकर एक गंभीर वैचारिक भ्रम देखने को मिलता है। कई बार पवित्रता को डर, अलगाव और पलायन के साथ जोड़ दिया जाता है। परिणामस्वरूप मसीही जीवन आगे बढ़ने के बजाय सिकुड़ता चला जाता है।

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प्रश्न यह है कि—क्या परमेश्वर ने हमें डर के साथ जीने के लिए बुलाया है, या विजयी जीवन के लिए?

पाप का डर बनाम पाप पर विजय

बाइबल स्पष्ट कहती है—

क्योंकि परमेश्वर ने हमें भय की नहीं, पर सामर्थ, प्रेम और संयम की आत्मा दी है।”

(2 तीमुथियुस 1:7)

यदि मसीही जीवन केवल इस डर में जिया जाए कि “कहीं पाप न हो जाए”, तो ऐसा जीवन न तो आत्मिक परिपक्वता देता है और न ही समाज में गवाही बन पाता है।

मसीह ने हमें डर के नीचे नहीं, अनुग्रह और सामर्थ के नीचे रखा है।

“पाप तुम पर प्रभुता न करेगा।”

(रोमियों 6:14)

क्या दूर भागना ही पवित्रता है?

अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि:

• व्यभिचार न हो, इसलिए स्त्री-पुरुष एक-दूसरे से दूर रहें

• चोरी न हो, इसलिए धन से दूरी बना ली जाए

• हिंसा न हो, इसलिए हाथ में छुरी तक न ली जाए

यदि ऐसा ही पवित्रता का मापदंड हो, तो फिर आत्म-संयम की आवश्यकता ही क्या रह जाती है?

बाइबल कहती है—

आत्मा का फल … संयम है।”

(गलातियों 5:22-23)

संयम का अर्थ है—

सामर्थ होते हुए भी पाप को न चुनना।@

यदि सामर्थ ही न हो, तो संयम का प्रश्न ही नहीं उठता।

यीशु मसीह : संसार में रहकर भी निष्पाप

यीशु मसीह

• समाज में रहे

• स्त्रियों से संवाद किया

• पापियों के साथ भोजन किया

फिर भी बाइबल गवाही देती है—

“वह सब बातों में हमारी नाईं परखे तो गए, तौभी निष्पाप निकले।”

(इब्रानियों 4:15)

यीशु ने संसार से भागकर नहीं,

संसार में रहकर पवित्रता का जीवन जिया।

यूसुफ और दानिय्येल : आत्म-संयम के उदाहरण

यूसुफ को पाप का अवसर मिला, पर उसने कहा—

“मैं यह बड़ा दुष्ट काम कैसे करूँ, और परमेश्वर के विरुद्ध पाप करूँ?”

(उत्पत्ति 39:9)

यूसुफ का भागना डर नहीं,

आत्मिक सामर्थ और परमेश्वर-भय का परिणाम था।@

दानिय्येल:

• राजमहल में रहा

• वैभव, भोजन और सत्ता के बीच रहा

फिर भी—

“दानिय्येल ने अपने मन में ठान लिया कि वह अपने को अशुद्ध न करेगा।”

(दानिय्येल 1:8)

यह है सच्ची पवित्रता—

मन का निर्णय, न कि परिस्थितियों से पलायन।

संसार में रहते हुए संसार जैसा न बनना

बाइबल यह नहीं कहती कि संसार छोड़ दो, बल्कि यह कहती है—

“इस संसार के सदृश न बनो।”

(रोमियों 12:2)

मसीही जीवन का उद्देश्य:

• दुनिया से कट जाना नहीं

• बल्कि दुनिया में रहते हुए अलग गवाही देना है

आत्मा के फल का वास्तविक अर्थ

यदि कोई व्यक्ति कहे:

• “मैं परीक्षा में ही नहीं पड़ता” तो आत्म-संयम कैसे प्रकट होगा?

आत्मा का फल अलगाव में नहीं,

परिस्थितियों के बीच प्रकट होता है।

निष्कर्ष

सच्ची मसीही पवित्रता:

• भय पर आधारित नहीं होती

• पलायन पर आधारित नहीं होती

• बल्कि आत्म-संयम, विश्वास और विजय पर आधारित होती है

दुनिया में चलते हुए भी,

दुनियादारी का प्रभाव हमारे जीवन पर न आए —

यही बाइबल की पवित्रता है।

PM News India

सत्य | विवेक | समाज

 

 

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