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हमारे अपने ही देश में पराये क्यों?” — मसीही समाज के साथ हो रहे अन्याय पर विचार

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Written by
Chavan

Editorial Analysis

यह लेख संवैधानिक, सामाजिक और मानवीय दृष्टि से मजबूत तर्क रखता है — ताकि यह विचार जगाने वाला बने, न कि विवाद बढ़ाने वाला।

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 हमारे अपने ही देश में पराये क्यों?” — मसीही समाज के साथ हो रहे अन्याय पर विचार

भारत — एक ऐसा देश जो “सर्वधर्म समभाव” की आत्मा पर टिका है, जहाँ हर व्यक्ति को अपने धर्म, अपनी आस्था और अपने विश्वास के अनुसार जीने की आज़ादी है।

लेकिन विडंबना यह है कि आज इसी देश में मसीही समाज को उसके धार्मिक अधिकारों, शांति और गरिमा से वंचित करने की कोशिशें तेज़ हो गई हैं।

संविधान क्या कहता है?

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 से 30 तक हर नागरिक को यह अधिकार देता है कि वह:

• किसी भी धर्म को मान सकता है,

• उसका प्रचार कर सकता है,

• और शांतिपूर्वक अपने घर या उपासना स्थल पर उपासना कर सकता है।

लेकिन जब कोई मसीही परिवार अपने स्वयं के घर में प्रार्थना सभा आयोजित करता है, तो उसी को धर्मांतरण की साजिश बताकर रोका जाता है, धमकाया जाता है, और यहाँ तक कि मारा-पीटा जाता है।

क्या यह संविधान की खुली अवहेलना नहीं है?

बायबल — धर्मांतरण का नहीं, परिवर्तन का ग्रंथ

बायबल केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था का स्रोत है।

यह वह ग्रंथ है जिसने नशे में डूबे जीवन को संयमित किया,

क्रोधी मन को शांत किया,

टूटे परिवारों को जोड़ा,

और असंख्य आत्माओं को सच्ची शांति दी।

बायबल किसी पर धर्म थोपना नहीं सिखाती —

बल्कि सच्चे प्रेम, सेवा, और मानवता का मार्ग दिखाती है।

और फिर भी आज, बायबल को “धर्मांतरण का साहित्य” कहकर बदनाम किया जा रहा है!

यह केवल एक किताब का अपमान नहीं,

बल्कि हमारी आस्था पर सीधा प्रहार है।

शांति से पूजा भी अपराध बन गई है

जहाँ एक ओर संविधान “शांति और सद्भाव” की बात करता है,

वहीं दूसरी ओर देश के कई हिस्सों में मसीही समाज को डर और धमकी के माहौल में जीना पड़ रहा है।

कई जगहों पर:

• चर्च बंद करवा दिए गए,

• घरों में चलने वाली छोटी प्रार्थना सभाएँ तोड़ी गईं,

• और महिलाओं-बच्चों तक को नहीं बख्शा गया।

यहाँ तक कि उग्र संगठन खुलेआम लोगों को घरों से निकालकर,

गालियाँ देकर, अर्धनग्न करके गाँव में घुमाते हैं —

और पुलिस अक्सर मौन दर्शक बनी रहती है।

यह प्रश्न उठता है —

क्या न्याय सिर्फ ताकतवरों के लिए है?

कानून का राज कहाँ है?

जब भीड़ तय करने लगे कि कौन क्या मानेगा,

तो फिर कानून का क्या मूल्य रह जाता है?

आज जो लोग “धर्म रक्षा” के नाम पर हिंसा कर रहे हैं,

वास्तव में वे देश की आत्मा को घायल कर रहे हैं।

भारत की आत्मा विविधता में एकता की है —

ना कि एकता में एकरूपता की।

अगर कोई समाज अपने घर में शांतिपूर्वक प्रार्थना भी नहीं कर सकता,

तो यह लोकतंत्र नहीं, डर का शासन कहलाएगा।

मसीही समाज — डर में जीती एक शांत आत्मा

मसीही समुदाय वह है जिसने हमेशा शिक्षा, स्वास्थ्य, सेवा और समाज कल्याण के कार्यों में योगदान दिया है।

लेकिन आज वही समाज अपने ही देश में असुरक्षित महसूस कर रहा है।

वह देश जिसके संविधान में बराबरी, आज़ादी और भाईचारे का वादा किया गया था —

वहीं अब मसीही परिवार अपने बच्चों को सिखा रहे हैं कि “प्रार्थना धीरे से करना बेटा, कोई सुन न ले।”

यह केवल धार्मिक उत्पीड़न नहीं —

बल्कि एक पूरे समाज की मानसिक और आत्मिक पीड़ा है।

अब समय है विचार करने का

यह प्रश्न सिर्फ मसीही समाज का नहीं है,

यह भारत की आत्मा का प्रश्न है।

अगर आज किसी को उसके विश्वास के कारण डराया जा सकता है,

तो कल किसी और को उसके विचारों के कारण चुप कराया जाएगा।

यह समय है कि समाज, सरकार और संवैधानिक संस्थाएँ मिलकर

इस अन्याय की आवाज़ सुनें —

क्योंकि धर्म की स्वतंत्रता, भारत की स्वतंत्रता का ही प्रतीक है।

अंतिम शब्द

हम शांति चाहते हैं, विवाद नहीं।

हम केवल अपने परमेश्वर की आराधना अपने घर में करना चाहते हैं,

किसी पर कुछ थोपना नहीं चाहते।

हम यह मांग नहीं करते कि हमें विशेष अधिकार दिए जाएँ —

बस इतना कि हमें हमारे मौलिक अधिकारों से वंचित न किया जाए।

क्योंकि

“जहाँ प्रभु की आत्मा है, वहाँ स्वतंत्रता है।” — 2 कुरिन्थियों 3:17

लेखक:  Sarichand Chavan

PM News India | www.pmnewsindia.com

संपर्क: pmnewsindia2025@gmail.com

 

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