Responsive Menu

Download App from

Download App

Follow us on

Donate Us

जानते हुए भी चुप समाज: स्वार्थ की संस्कृति और डूबता भविष्य

[responsivevoice_button voice="Hindi Female"]
Author Image
Written by
Chavan

 भविष्यजानते हुए भी चुप समाज: स्वार्थ की संस्कृति और डूबता भविष्य

PM News India विशेष रिपोर्ट

आज का समाज एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहाँ सबसे खतरनाक समस्या अज्ञान नहीं, बल्कि जानते हुए भी अनदेखा करना बन चुकी है।

Advertisement Box

माता-पिता जानते हैं कि उनके व्यवहार, भाषा और आचरण का बच्चों के मनोविज्ञान पर गहरा प्रभाव पड़ रहा है। समाज यह भी समझता है कि उसकी चुप्पी और स्वार्थ अगली पीढ़ी के चरित्र को प्रभावित कर रहे हैं। इसके बावजूद हालात जस के तस बने हुए हैं।

गलत सब कुछ, फिर भी सब सामान्य क्यों?

क्योंकि आज की सामाजिक मानसिकता “सुविधाजनक मौन” को प्राथमिकता दे रही है।

जब तक समस्या सीधे हमारे दरवाजे पर नहीं आती, तब तक हम उसे समस्या मानने से इनकार कर देते हैं। यही कारण है कि घरेलू हिंसा, बच्चों के साथ मानसिक दुर्व्यवहार, सामाजिक असंवेदनशीलता और नैतिक पतन को अब ‘निजी मामला’ कहकर टाल दिया जाता है।

व्यक्तिवाद की बढ़ती सोच

आज समाज “हम” से हटकर सिर्फ “मैं” तक सिमट गया है।

हर व्यक्ति अपने परिवार, अपने बच्चों और अपने लाभ तक सीमित हो चुका है।

सामूहिक जिम्मेदारी की भावना लगभग समाप्त होती जा रही है।

यह सोच धीरे-धीरे बच्चों में भी स्थान बना रही है, जहाँ सहयोग नहीं, प्रतिस्पर्धा; करुणा नहीं, कठोरता; और मूल्य नहीं, परिणाम महत्वपूर्ण हो गए हैं।

बच्चों पर पड़ता गहरा असर

विशेषज्ञ मानते हैं कि बच्चे शब्दों से नहीं, व्यवहार से सीखते हैं।

जब वे देखते हैं कि—

• माता-पिता आदर्श की बातें करते हैं, लेकिन आचरण विपरीत होता है

• समाज अन्याय को देखकर चुप रहता है

• स्वार्थ को समझदारी और चालाकी कहा जाता है

तो उनके भीतर नैतिक भ्रम पैदा होता है।

यह पीढ़ी भावनात्मक रूप से अस्थिर, संवेदनशीलता से दूर और रिश्तों में खोखली होती जा रही है।

धार्मिक क्षेत्रों में भी वही विरोधाभास

धार्मिक संस्थानों और मंचों पर त्याग, सेवा और प्रेम की बातें तो होती हैं,

लेकिन व्यवहार में स्वार्थ, वर्चस्व और दिखावा हावी होता दिख रहा है।

इस दोहरेपन का सबसे बुरा असर बच्चों और युवाओं पर पड़ता है, जो धर्म को जीवन-मूल्य नहीं बल्कि विरोधाभास के रूप में देखने लगते हैं।

भविष्य को लेकर उदासीनता क्यों?

क्योंकि आज का समाज तात्कालिक लाभ में उलझा है।

लंबी अवधि के परिणामों पर सोचने का धैर्य और इच्छा दोनों कम होती जा रही हैं।

यह मानसिकता कहती है—

“आज मेरा काम बन जाए, कल जो होगा देखा जाएगा।”

चेतावनी का समय

यदि यही प्रवृत्ति जारी रही, तो आने वाली पीढ़ी का जीवन स्तर

सिर्फ आर्थिक रूप से नहीं,

बल्कि नैतिक, सामाजिक और मानवीय रूप से भी गिरता चला जाएगा।

समाज, परिवार और धार्मिक नेतृत्व—

तीनों को आत्ममंथन की आवश्यकता है।

क्योंकि इतिहास गवाह है—

जो समाज अपने बच्चों के भविष्य की चिंता नहीं करता,

वह स्वयं भविष्यहीन हो जाता है।

PM News India इस विषय पर गंभीर सामाजिक विमर्श की आवश्यकता मानता है।

आज का राशिफल

वोट करें

भारत-पाकिस्तान के बीच संघर्ष विराम के बाद कांग्रेस ने संसद का विशेष सत्र बुलाने की मांग की है। क्या सरकार को इस पर विचार करना चाहिए?

Advertisement Box
Advertisement Box
WhatsApp