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आदिवासी समाज का गौरव पर्व – भोंगर्या

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Written by
Chavan

आदिवासी समाज का गौरव पर्व – भोंगर्या

मध्य भारत के आदिवासी अंचलों—विशेषकर मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात के भील-भिलाला, बारेला, पावरा समुदायों में मनाया जाने वाला भोंगर्या (भगोरिया) पर्व केवल एक मेला नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान का प्रतीक है।

यह पर्व मुख्य रूप से बारेला, पावरा, भील और भिलाला जनजातियों द्वारा होली से पूर्व फाल्गुन माह में मनाया जाता है।

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भोंगर्या का इतिहास

भोंगर्या की परंपरा सदियों पुरानी मानी जाती है। इतिहासकारों के अनुसार:

• यह पर्व प्राचीन आदिवासी स्वशासन व्यवस्था और हाट-बाज़ार संस्कृति से जुड़ा हुआ है।

• पहले यह स्थानीय रियासतों के समय में वार्षिक व्यापारिक मेलों के रूप में आयोजित होता था।

• समय के साथ यह मिलन, सांस्कृतिक उत्सव और परंपरा

बन गया।

भोंगर्या क्यों मनाते हैं?

भोंगर्या के पीछे तीन प्रमुख उद्देश्य हैं:

1️⃣ सामाजिक मिलन

यह अलग-अलग गांवों और कुलों के लोगों के मिलने का अवसर होता है।

2️⃣ आनेवाली नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति की जिवित रखने के लिये. 

परंपरागत रूप से इस माध्यम से अपनी संस्कृति की धरोहर को आगे बढ़ाना. नई पीढ़ी को उसमें बनाये रखना.

3️⃣ सांस्कृतिक अभिव्यक्ति

नृत्य, गीत, पारंपरिक वेशभूषा, ढोल-मांदल, बाजा—ये सब आदिवासी पहचान का प्रदर्शन हैं।

भोंगर्या का विशेष महत्व

सांस्कृतिक पहचान

यह पर्व आदिवासी अस्मिता और गौरव का प्रतीक है।

यह बताता है कि आदिवासी समाज की अपनी पहचान, सामाजिक संरचना और परंपराएँ हैं।

आर्थिक महत्व

भोंगर्या मेले में:

• कृषि उपकरण

• आभूषण

• पारंपरिक वस्त्र

• घरेलू सामग्री

• मिठाई

• फलोंकी

• गूळ

• खजूर

• दालियां

की खरीद होती है।

पारिवारिक खुशियां 

इस दिन घर के मुखिया, अपने बच्चों को, बहुओं को भोंगर्या में खर्च करने के लिए पैसे देते है. वह खुशियों का माहौल होता है.

भोंगर्या का दृश्य

• रंग-बिरंगी पगड़ियाँ

• चांदी के आभूषण

• महिलाएँ पारंपरिक लुगड़ा में

• युवक मांदल और ढोल बजाते हुए

• समूह नृत्य

• झुलोंमे झूलना

• बैल गाडी आना, अब तो लोग ट्रैक्टर, जीप, बस ऐसे अलग अलग वाहनोंसे आते हैं.

पूरा वातावरण उत्साह और रंगों से भर जाता है।

आधुनिक संदर्भ

आज भोंगर्या केवल परंपरा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अधिकार और पहचान का प्रतीक बन चुका है।

सरकारें भी इसे जनजातीय सांस्कृतिक विरासत के रूप में मान्यता देती हैं।

PM News India का दृष्टिकोण

भोंगर्या हमें यह सिखाता है कि भारत की विविधता ही उसकी शक्ति है।

आदिवासी समाज की परंपराएँ केवल “उत्सव” नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना और आत्मसम्मान का जीवंत इतिहास हैं।

आज आवश्यकता है:

• इन परंपराओं का सम्मान हो

• युवाओं को सही सांस्कृतिक शिक्षा मिले

• गलत धारणाओं को दूर किया जाए

निष्कर्ष

भोंगर्या केवल एक मेला नहीं —

यह है:

• आदिवासी स्वाभिमान

• सामाजिक स्वतंत्रता

• सांस्कृतिक समृद्धि

• और पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा का उत्सव

PM News India आदिवासी संस्कृति और समाज की असली पहचान को सामने लाने के लिए प्रतिबद्ध है।

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